डर और धुंआ

हर रोज़ की तरह आज भी मैंने दिव्य वाहन Uber में ऑफिस जाने का प्रण लेते हुए ऐप पे गाड़ी बुक कर ही ली.

ना जानते हुए कि ये सफर आज मुझे अपने बारे में एक नए पहलू से अवगत कराएगा.

थोड़ी देर बाद एक घनी दाढ़ी वाले भाई साहब स्विफ्ट डिज़ायर में प्रकट हुए, मानो एनवायरनमेंट चेंज को रोकने का सारा ज़िम्मा अपने चेहरे पे जंगल रुपी दाढ़ी उगाते हुए इन्ही ने लिया हो.

मुस्कुराते हुए गुड मॉर्निंग हुई और राइट स्वाइप कर उन्होंने ट्रिप चालू कर दी. मैं रोज़ की तरह दीन दुनिया को भूल न्यूसपेपर पढ़ने में जुट गया, मानो सिविल सर्विसेज का एग्जाम आज क्लियर कर के ही मानूंगा.

कुछ क्षण चल ड्राइवर साहब ने पीछे देखा और बोले:                                                                                    “सर थोड़ा सा लगी है, क्या मैं गाड़ी रोक कर हल्का हो लूँ“.

मैंने बिना कुछ सोचे उनके हालात को समझते हुए रज़ामंदी दे दी.

जैसे ही वो नीचे उतरे मेरा ध्यान सुनसान सड़क पे खड़ी हमारी गाड़ी पे गया जहाँ दूर दूर तक किसी प्राणी का कोई भी नामोनिशान ना था.

दिल में अचानक बुरे ख्यालों ने दस्तक दी, और कश्मीर में गाड़ियों में हो रहे धमाकों की छवि आँखों के समक्ष प्रकट हो गयी. ये शायद ज्यादा न्यूसपेपर पढ़ने का असर था.

पीछे मुड़ के देखा तो दाढ़ी वाले ड्राइवर साहब मानो दो कोस दूर जा चुके थे.

काउंटडाउन शुरू हो चुका था. जल्दी से न्यूसपेपर को बगल में रख गाड़ी से फरार होने का मैंने निर्णय ले लिया.

जैसे ही मैंने अपने दरवाज़ा को खोला और उतरना चाहा, तभी एक आवाज़ से मेरी रूह काँप उठी:                    “सॉरी सर, रुकने के लिए. क्या करूँ आगे कोई जगह नहीं मिलती“.

यह बोल ड्राइवर साहब गाड़ी में बैठे और खुद को पायलट और गाड़ी को हवाई जहाज़ बना कर वहां से उड़ चले.

ऑफिस पहुंच मैंने उन्हें थैंक यू बोला और गाड़ी से नीचे उतर गया.

Introducing Shukka

दिल अभी भी कुछ ज्यादा ही धड़क रहा था. मन बोला अब तो फ़िक्र को धुएं में उड़ाना बनता है.

एक सिगरेट शॉप पे पहुंच जैसे ही सुट्टा मांगने वाला था, तभी उस कश्मकश के परदे को समझ भूज ने फाड़ते हुए एक सवाल पूछ लिया:                                                                                                                    “#Sutta4G जो करते रहते हो, उसका क्या?

तब जाना, कभी कभी आपकी समझदारी आपको शर्म से पानी पानी होने पे मजबूर कर देती है.
भाई साहब, बाद में आता हूँ“, बोल मैं ऑफिस की ओर बढ़ गया.

चलते चलते समझ ने हस्ते हुए और मरहम लगाते हुए बोला:                                                                          “इस सुट्टे के पैसे से आज किसी गरीब को खाना खिला देना“.

ये सुन मेरा मन फिर एक निश्चय रुपी हर्ष से भर उठा और बोला:                                                              “Break the Habit. Do Good. #Sutta4G

Source for the Image: https://www.facebook.com/Sutta4G/

Just a Matter of Time!

अभी तो कुछ और था, अभी कुछ और है,
बदलते हुए लम्हे देख दिल ये बेकरार है,

कहते हैं सब वक़्त का तकाज़ा होता है,
यहाँ तो ज़िन्दगी-मौत भी वक़्त की मौहताज़ है,

कभी ये होता है, कभी वो होता है,
ज़िन्दगी होने ना होने में बीत जाती है,

जब तक इसको संभाल पाते,
हमारी तो शक्शियत भी ज़मीन में मिल जाती है,

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कहते हैं, क्या लेके आये थे, क्या लेके जायेंगे,
सब यहाँ का यहाँ छोड़ चले जायेंगे,

फिर काहे की फ़िक्र, काहे का रोना,
सब उसपे छोड़ दो, जो होना वही होना,

जियो तो ऐसे कि कोई कसर बाकी ना रह जाये,
बिना किसी गिला शिकवा के हस्ती खेलती गुज़र जाये,

इसे आदत बना लो तो कायनात भी हसीन लगती है,
ज़िन्दगी ऊपर से नीचे तक फिर रंगीन लगती है,

कहते हैं ज़िन्दगी पल में गुज़र जाती है,
इसी पल को जी भर के जी लो, ज़िन्दगी यही सिखाती है.

Source for the Image: https://www.facebook.com/Sutta4G/

एक छोटी सी इल्तजा

छोटी छोटी बातों से जो ख़ुशी मिल जाती थी कभी,
आज वो आलम है, सामने खड़ी ऑडी भी पराई लगती है,

वो एक रूपए से बीस ऑरेंज कैंडी का पॉकेट में आना,
वो स्कूल की कैंटीन में बन छोला का मुँह में इतराना,

वो इमली वाले को देख, मन का मचल जाना,
वो पॉकेट मनी का हर महीने जेब में आना,

वो कॉलेज में जन्मदिन पे दोस्तों को बाहर ले जाना,
वो ढाबे पे दो रूपए की चुस्कियों का मज़ा लेना,

वो लेक्चर में उसी के साथ बैठने का लुफ्त उठाना,
वो उधार की बाइक पे बैठ गंगा किनारे जाना,

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ज़िन्दगी कुछ बदली बदली लगती है दोस्तों,
सब होकर भी कुछ अजनबी सी लगती है दोस्तों,

कहते हैं सब पाके सब मिल जाता है,
यहाँ तो सब होकर भी खोयी सी लगती है दोस्तों,

जो बीत गया वो कभी ना लौटेगा,
जो पीछे छूट गया, वो दिल क्या खटखटाएगा,

इल्तजा तो बस इतनी सी है, ऐ ज़िन्दगी,
एक बार फिर ये सिखला दे,

छोटी छोटी बातों में खुशियों की एहमियत,
एक बार फिर इसका इल्म करा दें.

Source for the image: https://www.afaqs.com/news/media/50567_zindagi-to-off-air-from-tv-will-now-stream-on-ozee

व्यवहार, ज़िन्दगी का आधार

It’s said:

No matter how big you grow into,

No matter how wise you consider yourself,

No matter, how careful you are with maintaining public perception,

No matter, how hard you work on your personality,

The way you interact and behave with different stakeholders in your life, determines the real character of the individual,

Be it your wife whom you get to say good morning to each day of your life,

Be it your parents or siblings whom you get to talk to once in a while in this modern world,

Be it the driver who drops you to your office on each working day,

Be it the security guard, who tends to secure your life more than anyone else,

Be it the house maid, who makes your house functional each day,

Be it the office boy, who makes your stint in office comfortable,

Be it the colleagues and boss who tend to make you feel important,

Be it the grocery guy who tend to bring to your doorsteps the fruits of hard work of the farmers in our country,

or

Be it any random guy that you come across in this beautiful journey of life,

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At every point in your life, you get to interact with innumerable people,

on whom: you may or may not consider yourself dependent on;

What qualifies as maturity, is being able to make that all important interaction:

Respectable, 

Enjoyable, 

Valuable, 

and

Treating it as the very last interaction that you will ever get to do in your lifetime.

Not realizing that one day, it will all come to an end,

Be it your ego/persona, 

Be it the luxury cars that you get to sit in or drive,

Be it the assets that you own or aspire to own,

All will vanish in thin air or ether as they refer it to as in Vedic texts.

How soon you realize this and work on that all important interaction is your choice!

Source for the Image: https://newsatjama.jama.com/2014/06/13/cdc-report-highlights-risky-health-behaviors-in-high-school-students/

नीव!

जैसे किसी भी इमारत की नीव बहुत ज़रूरी होती है,

उसी तरह ज़िन्दगी की नीव का सही प्रकार से निर्माण करना अत्यंक आवश्यक है.

चाहे वो सड़क पे हो रहा ट्रैफिक जाम हो,

या

किसी रिश्ते में पड़ रही दरार,

चाहे वो अपना मानसिक संतुलन खोना हो,

या

किसी पे बेवजह बरस जाना,

चाहे नाम और पैसे कमाने के चक्कर में ज़िन्दगी जीना भूल जाना हो,

या

किसी गलत रास्ते पे निकल जाना,

चाहे खुद को खुदाह से बड़ा मानना हो,

या

किसी और इंसान की इज़्ज़त ना कर पाना,

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और ये सब ना होता अगर नीव सही तरीके से रक्खी जाती,

अगर

ड्राइविंग लाइसेंस बनाते समें किसी ने सही प्रकार से टेस्ट किया होता,

अगर

रिश्ते की अहमियत को हम समझते और एक दूसरे के प्रति सम्मान रखते,

अगर

किसी पे बरसने से पहले एक क्षण के लिए हम ये सोचते कि हर इंसान उस परम उत्पत्ति का ही अंश है,

अगर

ज़िन्दगी के हर उस पल के अहसास को हमें महसूस कर पाने की क्षमता होती.

इसलिए ज़रूरी ये है कि हम कैसे ये नीव रखते है : उसपे विचार करें,

ना कि उस नीव के ढंग से ना रक्खे जा पाने से उत्पन होने वाले परिणामो पर.

ये तभी तक उपयोगदायक है जब तक ये हमको उन परिस्थितियों से अवगत कराने का काम करते हैं,

ना कि उनके उपाए या उसके पीछे मौलिक कारणो पे.

इसलिए, ज़रूरी ये है कि इन विचारों के नीव पे हम ध्यान दें

और

इस ज़िन्दगी के सही मायनो को समझे.

Source for the Image: https://www.moonastro.com/babyname/baby%20name%20neev%20meaning.aspx

कुछ ऐसे पल !

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लम्हों का याद आना, उनमें खो जाना,
एक आदत सा बन चुका है,

कश्ती का पास आना, हवा का छू के निकल जाना,
एक एहसास सा बन चुका है,

तैरना तो कभी हमने सीखा ही ना था,
हर पल में डूब जाना एक फितूर सा बन चुका है,

इस ज़िन्दगी के सफर की क्या ही बताऊँ,
वक़्त का ऐसे गुज़र जाना, चाहत सा बन चुका है,

कहते हैं, ख्वाइशों का कोई अंत नहीं होता,
इन ख्वाशों के पार भी एक दुनिया है,

फ़िक्र तो होती है उस दुनिया के बारे में सोच के,
वो एक पल सारी फ़िक्र छोड़ के आगे बढ़ चुका है.

Source for the Image: https://www.goalcast.com/2016/06/23/how-to-seize-the-moment/

हसरते !

(Inspired from my conversation I had with a security guard in the building)

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हसरते तो बहुत है पर क्या करूँ, पूरी नहीं होती,
सुबह ५ बजे उठने के बाद भी चैन से जीने नहीं देती,

मास्टर साहब कहते थे, सपने देखना कभी मत छोड़ना,
ज़िन्दगी की उड़ान को कभी रुकते हुए मत देखना,

कुछ करना ऐसा जिससे सारी दुनिया सलाम करे,
दूर से देख लम्बी आहें भरे,

आज हालत ये हैं, कि सलाम करना एक आदत बन चुकी है,
सारी चाहते पानी में मिल चुकी है,

उनको क्या बताऊँ, सब छूट सा गया है,
दिल भी बेहाल डूब सा गया है,

नींद नहीं आती ये सोच के कि कल क्या होगा,
उस ट्रेन का सफर, कहीं आखरी सफर ना होगा,

सुबह शाम बस यही सोचता रहता हूँ,
क्या नसीब हमेशा ऐसा ही होगा,

क्या बताऊँ साहब, अब जीने का मन नहीं करता,
घर का हाल देख, घर जाने का मन नहीं करता,

माँ कहती है कि हिम्मत कभी मत हारना बेटा,
ज़िन्दगी एक संघर्ष है, इसको कभी झुटलाना नहीं बेटा,

एक दिन सफलता ज़रूर तुम्हारे कदम चूमेगी,
सपने देखना कभी मत छोड़ना बेटा.

Source for the Image: http://www.jantakareporter.com/india/security-guards/62284/

 

सब बढ़िया है!

There are so many ifs and buts in our lives that I wonder how can one remain happy, calm and composed with things going on all the time in our minds.

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A humble tribute to the ifs and buts which constantly seem to nag us day-in-day-out:

सब बढ़िया है, जब तक बॉस ने डाटा ना हो,
सब बढ़िया है, जब तक बीवी ने आज लेट आने पे क्लास ना लगाई हो,

सब बढ़िया है, जब तक वो लोन की ई म आई टाइम पे ना गयी हो,
सब बढ़िया है, जब तक स्कूल के प्रिंसिपल ने पप्पू की कंप्लेंट करने ना बुलाया हो,

सब बढ़िया है, जब तक किसी फॅमिली मेमबर को डॉक्टर के यहाँ ना जाना पड़ा हो,
सब बढ़िया है, जब तक पड़ोसी ने गाडी गलत पार्क करने पर लड़ाई ना करी हो,

सब बढ़िया है, जब तक किसी काली बिल्ली ने रास्ता ना काटा हो,
सब बढ़िया है, जब तक रास्ते में ड्राइव करते समय ट्रैफिक ना मिला हो,

सब बढ़िया है, जब तक बिजली, पानी इत्यादि की कोई प्रॉब्लम ना हुई हो,
सब बढ़िया है, जब तक आगे करियर कहाँ जाएगा, इसका पता ना हो,

वैसे तो सब बढ़िया ही है, जब तक!

This जब तक  in our lives is screwing us big time.

The question, though, is are we all prepared to let go of this जब तक? for actually realizing the सब बढ़िया है!

Source for the Image: https://www.pexels.com/search/good/

कभी भूले भटके!

Being caught up in the आपा धापी  of life, there are very few occasions when you end up feeling like what I did today,

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To put it in other words, on very few occasions do we end up taking notice of the same.

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Sharing a few lines in my effort to express what it is:

कभी भूले भटके, ज़िन्दगी अपने से परे लगती है,
कभी भूले भटके, कायनात कुछ और हसीन लगती है,
कभी भूले भटके, चहचहाती चिड़ियाँ दिखती हैं,
कभी भूले भटके, ये हवा चेहरे को छूती है,

कभी भूले भटके, किसी और का ख्याल आता है,
कभी भूले भटके, इंसान इंसान नज़र आता है,
कभी भूले भटके, खुद का पता नहीं चलता,
कभी भूले भटके, इस मदहोशी का आलम आता है,

कभी भूले भटके, मन बेतहाशा सा हो जाता है,
कभी भूले भटके, वही मन कुछ गुनगुनाता है,
कभी भूले भटके, भटकना भी रास आता है,
कभी भूले भटके, उसी भटकने का अंदाज़ पसंद आता है.

और अगर, आपको ये अहसास कभी ना हुआ हो, तो कभी भटक कर तो देखिये,

भूले भटके ही सही, आप उस राह पहुंच ही जायेंगे,
जहाँ भटकना ही शायद इस जीवन का आगाज़  कराता है.

Source for the Image: https://www.shutterstock.com/search/lost

Hospital-ity!

Let me treat the word “hospitality” as two:hospital and fatality.

Without getting into the definitions of each, what one tends to attribute to the former is the latter.

Though, a hospital apart from taking care of the cases of fatality, also has a very beautiful aspect to it, which is bringing new lives into this world.

On one hand, where one can observe blood spilling all over either due to the accidents or a calamity,

On the other hand, one can witness the same blood unfolding magic of life which can be seen happening right in front of one’s eyes.

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This makes me wonder, what we call contradictions, are nothing but the 2 sides of the same coin.

For death is no different in space and time as the birth, happening every moment of our experiential lives,

Scientifically and at an individual level which might be represented in the dynamics of the trillions of cells which constitute our body.

What differs though is our perceptions in terms of which side of the coin we have a tendency to look at.

Why am I calling it a tendency is because most of us go by the same, though each and every aspect is under our control if we choose to take control.

Whatever it might be, whether you take control or not, this game of hospital-ity or the game of life & death happens day-in-day-out.

Better to take at least some control, though, if you want to enjoy this game,

For if the shuttle or the ball (depends on which sports you play), doesn’t go where you want it to,

Why the hell one is playing this game for? 😉

Source for the Image: https://www.talenthive.co.uk/blog/different-sectors-hospitality-industry