The Ever Last-ing

20 missed calls…yet no reply….make it 40..result the same…
what is the matter?
what could have happened?
it was just a fight!
how could she?
it doesn’t happen like that?
well…sometimes it does!
but she calls back every time.
Alright! no more talking to her ever again!
or let me see…should i give her another chance?
but why me every time?
this is truly unfair!
The phone got picked up on the 41st:
Hey what’s the matter with you? Why are you not picking my calls?”
Who’s this?“, a guy spoke from the other side.
Who are you? Where is Sanjana? Give her the phone.”
You should come to the Apollo immediately in case you know her”, and the guy disconnected.
Apollo? How come?
I hope it’s not that bad!
How stupid I was to think like that!
Alright, I will not fight with you….I promise.
Thoughts kept pouring off his mind as he drove his bike at full throttle.
Where is she, I mean Sanjana!”
Are you the guy who just called, she is in ward no. 13″, the nurse at the reception directed him to proceed in the all important direction.
There she was….Sanjana….lying unconscious….
how did that happen?
It’s an accident case. She was brought an hour back”, the doc in attendance spoke.
1 hour? Are you guys crazy? Why you didn’t inform?
Is she alright, doc?”
Lot of blood has been lost, it’s a bit critical, we will try our best”
You gotta try better. What the hell are you talking?
Time passed…an hour later
For the last and final time she opened her eyes and looked at me:
where do you keep wandering around…
 
in the dreams…or for real…
 
in both cases the world travels with you….
 
some where some day it has to be…
 
some day some where it will be…
 
and then the calm and darkness will prevail…
 
leading to the light that you always craved for!
bye-written-sand-7929543

Resolutions: USNE-उसने

What do we do when something goes wrong?

or

We meet with an accident?

or

We don’t qualify an exam?

or

We are beaten up by a teacher?

What is the first reaction in such situations?

We try to get into an escapist role, where we start to put the blame on either the:

Situation

or

Other person

You

Have you ever given it a consideration, why it’s so difficult to take responsibility for our own actions?

Why the hesitation of not being able to accept the situation and the consequences of the same, which by the way, happens because of our own actions?

What is it that we fear?

Won’t it be better if we were to stand up for, if nothing else, our own actions?

At least that would make us less:

Insecure,

Fearsome,

And

Make us more:

Sensible,

Confident

Individuals, who are prepared to provide solutions to problems.

So, till the time one realizes that there is nothing like Hum Tum (You and Me),

Till we still have a tendency to delve into the duality of everything in existence,

Till we understand that we are no different from each other,

Why not make a fresh start,

A new year resolution,

Which makes us at least not put the blame on the other person (USNE-उसने).

The only question being, are we prepared to take up this challenge in 2020?

Source for the Image: http://pluspng.com/and-you-png-9765.html

ऐ ज़िन्दगी-नयी सुबह का आग़ाज़

वैसे तो हर नयी सुबह की पहली किरण एक नया एहसास ले ही आती है,

इस नए साल की सुबह कुछ हसीन ख़याल और इत्तेफ़ाक़ ज़रूर ले आयी,

आखिर पूरे डिकेड का सवाल जो था,

कभी कभी ज़िन्दगी का रुख बदलने के लिए एक लम्हा ही काफी होता है,

वजह कुछ भी हो सकती है इस परिवर्तन की,

चाहे वो नज़रों का नज़रों से टकरा जाना हो,

या

उस एक मुस्कराहट के लिए दुनिया के सफर पे निकल जाना,

चाहे उस रात का दिल बहल जाना हो,

या

उस छवि का दिल में बस जाना,

चाहे उन कापते हुए हांथों का थाम लेने की चाह हो,

या

किसी के लिए कुछ कर जाने का जज़्बा,

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हर वो लम्हा एक यादो की कड़ी पिरो ही देता है,

कभी भागते थे जिस याद से,

आज उसी को सिमटा के कहीं बैठ जाते हैं,

यही कुछ यादें ही तो है जो ज़िन्दगी को ज़िन्दगी का दर्ज़ा देती है,

कभी पूछेंगे इस ज़िन्दगी से सवाल,

ऐ ज़िन्दगी तू कहाँ थी कभी जो अभी अभी यहाँ है,

शायद डूब जाना ही तो है,

या

डूब के खुद को पा लेने का नाम-ये ज़िन्दगी

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गाँधी और बंदर

बंदरों का हम सबकी ज़िन्दगी में बहुत अहम् रोल रहा है.

चाहे वो हमारा एवोल्यूशन ही क्यों ना हो

या फिर

बुराई को ना देखने का, ना सुनने का और ना बोलने की हिदायत ही क्यों ना हो.

कहते हैं अच्छी चीज़ों पे फोकस करो तो ज़िन्दगी हसीन लगने लगती है,

हर इंसान के अच्छे पहलू पे फोकस करने को डेल कार्नेगी भी लिख गए है.

पर जैसे ही इन किताबों का हैंगओवर पूरा होता है,

और

गांधीजी कहीं किसी कहानी में खो जाते हैं,

फिर वही हम और हमारी क्रिटिकल शक्की नजरिया,

ये ऐसा है,

ये वैसा है,

इसने मुझे ये कैसे कहा,

उसने मुझे ऐसा कह दिया,

मुझे इसने इज़्ज़त नहीं नवाज़ी,

उसने मुझे गरिया दिया,

शिकायती टट्टू बनने में हमें बिलकुल देर नहीं लगती,

आज सुबह जब मैं कैब में आ रहा था,

तब ट्रैफिक में चलते हुए लोगों की आपा धापी देख के मैं घबरा गया,

पहले गुस्सा आया दुनिया के इस रवैये पे,

फिर दूसरे पल मैंने एक चिंता का मखौटा पहन लिया,

चिंता के बाद कुछ ना कर पाने की हताशे में मैं डूबने ही वाला था,

तभी

गांधीजी के तीन बंदरों की छवि मेरे समक्ष आ गयी और मैं हस पड़ा,

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इससे मैं टेंशन मुक्त तो हो गया

पर

क्या यही एक रास्ता है इन सब से पीछा छुड़ाने का,

ये विचार करने लगा,

आपको क्या लगता है,

इस बदलते समय में जिस तरफ हमारा देश और दुनिया अग्रसर है,

चाहे वो हो रहे रेप या हत्याएं हो,

चाहे वो सड़क पे बढ़ता हुआ गुस्सा और अग्रेशन हो,

चाहे वो पैसे के पीछे भागने की होड़ हो,

चाहे वो वैल्यू सिस्टम का समाप्त होना हो,

चाहे वो माँ बाप की सेवा करने से हाथ धो लेना हो,

चाहे वो इस वातावरण को तहस नहस कर देने का हमारा व्यवहार हो,

या

चाहे सिर्फ अपने बारे में सोचने की आदत हो,

क्या सिर्फ अच्छे पहलू को देखना ही इसका एक मात्र उत्तर है,

और अगर नहीं,

तो क्या हम सबको अपने अपने लेवल पे एफर्ट करने की ज़रुरत नहीं है,

इस ज़िम्मेदारी को हम सबको समझने की बहुत ज़रुरत है,

जिससे एक अच्छे सोसाइटी का निर्माण किया जा सके,

इसके लिए हमें गांधीजी के उन तीन बंदरों को इगनोर करना ही क्यों ना पड़े,

सवाल बस इतना सा है दोस्तों,

क्या हम खुद से ऊपर उठ कर

इस दुनिया में जी रहे और लोगों जीव जंतुओं के बारे में सोच कर

एक सही सिस्टम के निर्माण का निर्णय लेने को तैयार है या नहीं?

Source for the Image: https://navbharattimes.indiatimes.com/other/sunday-nbt/future-stars/three-monkeys-of-gandhi/articleshow/29820353.cms

डर और धुंआ

हर रोज़ की तरह आज भी मैंने दिव्य वाहन Uber में ऑफिस जाने का प्रण लेते हुए ऐप पे गाड़ी बुक कर ही ली.

ना जानते हुए कि ये सफर आज मुझे अपने बारे में एक नए पहलू से अवगत कराएगा.

थोड़ी देर बाद एक घनी दाढ़ी वाले भाई साहब स्विफ्ट डिज़ायर में प्रकट हुए, मानो एनवायरनमेंट चेंज को रोकने का सारा ज़िम्मा अपने चेहरे पे जंगल रुपी दाढ़ी उगाते हुए इन्ही ने लिया हो.

मुस्कुराते हुए गुड मॉर्निंग हुई और राइट स्वाइप कर उन्होंने ट्रिप चालू कर दी. मैं रोज़ की तरह दीन दुनिया को भूल न्यूसपेपर पढ़ने में जुट गया, मानो सिविल सर्विसेज का एग्जाम आज क्लियर कर के ही मानूंगा.

कुछ क्षण चल ड्राइवर साहब ने पीछे देखा और बोले:                                                                                    “सर थोड़ा सा लगी है, क्या मैं गाड़ी रोक कर हल्का हो लूँ“.

मैंने बिना कुछ सोचे उनके हालात को समझते हुए रज़ामंदी दे दी.

जैसे ही वो नीचे उतरे मेरा ध्यान सुनसान सड़क पे खड़ी हमारी गाड़ी पे गया जहाँ दूर दूर तक किसी प्राणी का कोई भी नामोनिशान ना था.

दिल में अचानक बुरे ख्यालों ने दस्तक दी, और कश्मीर में गाड़ियों में हो रहे धमाकों की छवि आँखों के समक्ष प्रकट हो गयी. ये शायद ज्यादा न्यूसपेपर पढ़ने का असर था.

पीछे मुड़ के देखा तो दाढ़ी वाले ड्राइवर साहब मानो दो कोस दूर जा चुके थे.

काउंटडाउन शुरू हो चुका था. जल्दी से न्यूसपेपर को बगल में रख गाड़ी से फरार होने का मैंने निर्णय ले लिया.

जैसे ही मैंने अपने दरवाज़ा को खोला और उतरना चाहा, तभी एक आवाज़ से मेरी रूह काँप उठी:                    “सॉरी सर, रुकने के लिए. क्या करूँ आगे कोई जगह नहीं मिलती“.

यह बोल ड्राइवर साहब गाड़ी में बैठे और खुद को पायलट और गाड़ी को हवाई जहाज़ बना कर वहां से उड़ चले.

ऑफिस पहुंच मैंने उन्हें थैंक यू बोला और गाड़ी से नीचे उतर गया.

Introducing Shukka

दिल अभी भी कुछ ज्यादा ही धड़क रहा था. मन बोला अब तो फ़िक्र को धुएं में उड़ाना बनता है.

एक सिगरेट शॉप पे पहुंच जैसे ही सुट्टा मांगने वाला था, तभी उस कश्मकश के परदे को समझ भूज ने फाड़ते हुए एक सवाल पूछ लिया:                                                                                                                    “#Sutta4G जो करते रहते हो, उसका क्या?

तब जाना, कभी कभी आपकी समझदारी आपको शर्म से पानी पानी होने पे मजबूर कर देती है.
भाई साहब, बाद में आता हूँ“, बोल मैं ऑफिस की ओर बढ़ गया.

चलते चलते समझ ने हस्ते हुए और मरहम लगाते हुए बोला:                                                                          “इस सुट्टे के पैसे से आज किसी गरीब को खाना खिला देना“.

ये सुन मेरा मन फिर एक निश्चय रुपी हर्ष से भर उठा और बोला:                                                              “Break the Habit. Do Good. #Sutta4G

Source for the Image: https://www.facebook.com/Sutta4G/

Just a Matter of Time!

अभी तो कुछ और था, अभी कुछ और है,
बदलते हुए लम्हे देख दिल ये बेकरार है,

कहते हैं सब वक़्त का तकाज़ा होता है,
यहाँ तो ज़िन्दगी-मौत भी वक़्त की मौहताज़ है,

कभी ये होता है, कभी वो होता है,
ज़िन्दगी होने ना होने में बीत जाती है,

जब तक इसको संभाल पाते,
हमारी तो शक्शियत भी ज़मीन में मिल जाती है,

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कहते हैं, क्या लेके आये थे, क्या लेके जायेंगे,
सब यहाँ का यहाँ छोड़ चले जायेंगे,

फिर काहे की फ़िक्र, काहे का रोना,
सब उसपे छोड़ दो, जो होना वही होना,

जियो तो ऐसे कि कोई कसर बाकी ना रह जाये,
बिना किसी गिला शिकवा के हस्ती खेलती गुज़र जाये,

इसे आदत बना लो तो कायनात भी हसीन लगती है,
ज़िन्दगी ऊपर से नीचे तक फिर रंगीन लगती है,

कहते हैं ज़िन्दगी पल में गुज़र जाती है,
इसी पल को जी भर के जी लो, ज़िन्दगी यही सिखाती है.

Source for the Image: https://www.facebook.com/Sutta4G/

एक छोटी सी इल्तजा

छोटी छोटी बातों से जो ख़ुशी मिल जाती थी कभी,
आज वो आलम है, सामने खड़ी ऑडी भी पराई लगती है,

वो एक रूपए से बीस ऑरेंज कैंडी का पॉकेट में आना,
वो स्कूल की कैंटीन में बन छोला का मुँह में इतराना,

वो इमली वाले को देख, मन का मचल जाना,
वो पॉकेट मनी का हर महीने जेब में आना,

वो कॉलेज में जन्मदिन पे दोस्तों को बाहर ले जाना,
वो ढाबे पे दो रूपए की चुस्कियों का मज़ा लेना,

वो लेक्चर में उसी के साथ बैठने का लुफ्त उठाना,
वो उधार की बाइक पे बैठ गंगा किनारे जाना,

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ज़िन्दगी कुछ बदली बदली लगती है दोस्तों,
सब होकर भी कुछ अजनबी सी लगती है दोस्तों,

कहते हैं सब पाके सब मिल जाता है,
यहाँ तो सब होकर भी खोयी सी लगती है दोस्तों,

जो बीत गया वो कभी ना लौटेगा,
जो पीछे छूट गया, वो दिल क्या खटखटाएगा,

इल्तजा तो बस इतनी सी है, ऐ ज़िन्दगी,
एक बार फिर ये सिखला दे,

छोटी छोटी बातों में खुशियों की एहमियत,
एक बार फिर इसका इल्म करा दें.

Source for the image: https://www.afaqs.com/news/media/50567_zindagi-to-off-air-from-tv-will-now-stream-on-ozee

व्यवहार, ज़िन्दगी का आधार

It’s said:

No matter how big you grow into,

No matter how wise you consider yourself,

No matter, how careful you are with maintaining public perception,

No matter, how hard you work on your personality,

The way you interact and behave with different stakeholders in your life, determines the real character of the individual,

Be it your wife whom you get to say good morning to each day of your life,

Be it your parents or siblings whom you get to talk to once in a while in this modern world,

Be it the driver who drops you to your office on each working day,

Be it the security guard, who tends to secure your life more than anyone else,

Be it the house maid, who makes your house functional each day,

Be it the office boy, who makes your stint in office comfortable,

Be it the colleagues and boss who tend to make you feel important,

Be it the grocery guy who tend to bring to your doorsteps the fruits of hard work of the farmers in our country,

or

Be it any random guy that you come across in this beautiful journey of life,

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At every point in your life, you get to interact with innumerable people,

on whom: you may or may not consider yourself dependent on;

What qualifies as maturity, is being able to make that all important interaction:

Respectable, 

Enjoyable, 

Valuable, 

and

Treating it as the very last interaction that you will ever get to do in your lifetime.

Not realizing that one day, it will all come to an end,

Be it your ego/persona, 

Be it the luxury cars that you get to sit in or drive,

Be it the assets that you own or aspire to own,

All will vanish in thin air or ether as they refer it to as in Vedic texts.

How soon you realize this and work on that all important interaction is your choice!

Source for the Image: https://newsatjama.jama.com/2014/06/13/cdc-report-highlights-risky-health-behaviors-in-high-school-students/

नीव!

जैसे किसी भी इमारत की नीव बहुत ज़रूरी होती है,

उसी तरह ज़िन्दगी की नीव का सही प्रकार से निर्माण करना अत्यंक आवश्यक है.

चाहे वो सड़क पे हो रहा ट्रैफिक जाम हो,

या

किसी रिश्ते में पड़ रही दरार,

चाहे वो अपना मानसिक संतुलन खोना हो,

या

किसी पे बेवजह बरस जाना,

चाहे नाम और पैसे कमाने के चक्कर में ज़िन्दगी जीना भूल जाना हो,

या

किसी गलत रास्ते पे निकल जाना,

चाहे खुद को खुदाह से बड़ा मानना हो,

या

किसी और इंसान की इज़्ज़त ना कर पाना,

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और ये सब ना होता अगर नीव सही तरीके से रक्खी जाती,

अगर

ड्राइविंग लाइसेंस बनाते समें किसी ने सही प्रकार से टेस्ट किया होता,

अगर

रिश्ते की अहमियत को हम समझते और एक दूसरे के प्रति सम्मान रखते,

अगर

किसी पे बरसने से पहले एक क्षण के लिए हम ये सोचते कि हर इंसान उस परम उत्पत्ति का ही अंश है,

अगर

ज़िन्दगी के हर उस पल के अहसास को हमें महसूस कर पाने की क्षमता होती.

इसलिए ज़रूरी ये है कि हम कैसे ये नीव रखते है : उसपे विचार करें,

ना कि उस नीव के ढंग से ना रक्खे जा पाने से उत्पन होने वाले परिणामो पर.

ये तभी तक उपयोगदायक है जब तक ये हमको उन परिस्थितियों से अवगत कराने का काम करते हैं,

ना कि उनके उपाए या उसके पीछे मौलिक कारणो पे.

इसलिए, ज़रूरी ये है कि इन विचारों के नीव पे हम ध्यान दें

और

इस ज़िन्दगी के सही मायनो को समझे.

Source for the Image: https://www.moonastro.com/babyname/baby%20name%20neev%20meaning.aspx

कुछ ऐसे पल !

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लम्हों का याद आना, उनमें खो जाना,
एक आदत सा बन चुका है,

कश्ती का पास आना, हवा का छू के निकल जाना,
एक एहसास सा बन चुका है,

तैरना तो कभी हमने सीखा ही ना था,
हर पल में डूब जाना एक फितूर सा बन चुका है,

इस ज़िन्दगी के सफर की क्या ही बताऊँ,
वक़्त का ऐसे गुज़र जाना, चाहत सा बन चुका है,

कहते हैं, ख्वाइशों का कोई अंत नहीं होता,
इन ख्वाशों के पार भी एक दुनिया है,

फ़िक्र तो होती है उस दुनिया के बारे में सोच के,
वो एक पल सारी फ़िक्र छोड़ के आगे बढ़ चुका है.

Source for the Image: https://www.goalcast.com/2016/06/23/how-to-seize-the-moment/