Delta Space!

Don’t know why, but this morning, got reminded of the line that has become quite famous, courtesy Anu Malik, the Bollywood music director,

आग लगा दूंगा!

Somehow, this line has become synonymous with the presence of the very being.

On similar lines, when actor and music director, Himesh Reshamiya says,

मुझे तुम्हारे घर में रोटी चाहिए!

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It somehow translates to developing a connect between the one who gets to hear with the person who uttered the same in the first place.

Pretty interesting, how our brain interprets things and tends to store things in our memories, which essentially forms the basis of how brands work.

Brands are on a constant lookout on how one can get a piece of the mind share of their target audience.

They keep coming up with all kinds of innovations,

Be it in the copy (written part)

or

Design of the communication they plan to send across to the world.

As with every other thing in this world, few work and few don’t.

No matter, how much analysis one does over the success or failure of the same,

It’s that black-box which in spite of innumerable theories and hypothesis, have never been figured out to the core.

Supposedly, no concrete formula exists.

With changing times, different things seem to find a resonance with the audience.

It’s that game of dice, where one throws the dice, based on the intellect and creativity one has, limited yet inflated in time.

Be present where your audience is!” as a generic rule seems to resonate with the who’s who of branding.

Catch their attention to get them thinking!” follows the omnipresence.

Calling them to act!” being the ultimate.

In this frenzy of finding what will work, 

How one is able to develop that all important emotional connect with the audience,

determines

Whether one’s brand is able to find that all important delta space in a consumer’s mind.

Source for the Image: http://www.himeshreshammiya-reviews.com/102-mujhe-tere-ghar-mein-roti-chahiye-struggling-nahi

नीव!

जैसे किसी भी इमारत की नीव बहुत ज़रूरी होती है,

उसी तरह ज़िन्दगी की नीव का सही प्रकार से निर्माण करना अत्यंक आवश्यक है.

चाहे वो सड़क पे हो रहा ट्रैफिक जाम हो,

या

किसी रिश्ते में पड़ रही दरार,

चाहे वो अपना मानसिक संतुलन खोना हो,

या

किसी पे बेवजह बरस जाना,

चाहे नाम और पैसे कमाने के चक्कर में ज़िन्दगी जीना भूल जाना हो,

या

किसी गलत रास्ते पे निकल जाना,

चाहे खुद को खुदाह से बड़ा मानना हो,

या

किसी और इंसान की इज़्ज़त ना कर पाना,

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और ये सब ना होता अगर नीव सही तरीके से रक्खी जाती,

अगर

ड्राइविंग लाइसेंस बनाते समें किसी ने सही प्रकार से टेस्ट किया होता,

अगर

रिश्ते की अहमियत को हम समझते और एक दूसरे के प्रति सम्मान रखते,

अगर

किसी पे बरसने से पहले एक क्षण के लिए हम ये सोचते कि हर इंसान उस परम उत्पत्ति का ही अंश है,

अगर

ज़िन्दगी के हर उस पल के अहसास को हमें महसूस कर पाने की क्षमता होती.

इसलिए ज़रूरी ये है कि हम कैसे ये नीव रखते है : उसपे विचार करें,

ना कि उस नीव के ढंग से ना रक्खे जा पाने से उत्पन होने वाले परिणामो पर.

ये तभी तक उपयोगदायक है जब तक ये हमको उन परिस्थितियों से अवगत कराने का काम करते हैं,

ना कि उनके उपाए या उसके पीछे मौलिक कारणो पे.

इसलिए, ज़रूरी ये है कि इन विचारों के नीव पे हम ध्यान दें

और

इस ज़िन्दगी के सही मायनो को समझे.

Source for the Image: https://www.moonastro.com/babyname/baby%20name%20neev%20meaning.aspx

कुछ ऐसे पल !

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लम्हों का याद आना, उनमें खो जाना,
एक आदत सा बन चुका है,

कश्ती का पास आना, हवा का छू के निकल जाना,
एक एहसास सा बन चुका है,

तैरना तो कभी हमने सीखा ही ना था,
हर पल में डूब जाना एक फितूर सा बन चुका है,

इस ज़िन्दगी के सफर की क्या ही बताऊँ,
वक़्त का ऐसे गुज़र जाना, चाहत सा बन चुका है,

कहते हैं, ख्वाइशों का कोई अंत नहीं होता,
इन ख्वाशों के पार भी एक दुनिया है,

फ़िक्र तो होती है उस दुनिया के बारे में सोच के,
वो एक पल सारी फ़िक्र छोड़ के आगे बढ़ चुका है.

Source for the Image: https://www.goalcast.com/2016/06/23/how-to-seize-the-moment/

हसरते !

(Inspired from my conversation I had with a security guard in the building)

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हसरते तो बहुत है पर क्या करूँ, पूरी नहीं होती,
सुबह ५ बजे उठने के बाद भी चैन से जीने नहीं देती,

मास्टर साहब कहते थे, सपने देखना कभी मत छोड़ना,
ज़िन्दगी की उड़ान को कभी रुकते हुए मत देखना,

कुछ करना ऐसा जिससे सारी दुनिया सलाम करे,
दूर से देख लम्बी आहें भरे,

आज हालत ये हैं, कि सलाम करना एक आदत बन चुकी है,
सारी चाहते पानी में मिल चुकी है,

उनको क्या बताऊँ, सब छूट सा गया है,
दिल भी बेहाल डूब सा गया है,

नींद नहीं आती ये सोच के कि कल क्या होगा,
उस ट्रेन का सफर, कहीं आखरी सफर ना होगा,

सुबह शाम बस यही सोचता रहता हूँ,
क्या नसीब हमेशा ऐसा ही होगा,

क्या बताऊँ साहब, अब जीने का मन नहीं करता,
घर का हाल देख, घर जाने का मन नहीं करता,

माँ कहती है कि हिम्मत कभी मत हारना बेटा,
ज़िन्दगी एक संघर्ष है, इसको कभी झुटलाना नहीं बेटा,

एक दिन सफलता ज़रूर तुम्हारे कदम चूमेगी,
सपने देखना कभी मत छोड़ना बेटा.

Source for the Image: http://www.jantakareporter.com/india/security-guards/62284/

 

तेरी खातिर !

This is a humble tribute to the Indian Team, who performed so well during the World Cup and especially the man, who is fondly referred to as Mahi, our very own Mahendra Singh Dhoni (MSD).

I don’t remember seeing MSD the way when he left the field, for the last time in a World Cup match.

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Few lines to the emotions that he might have gone through walking back to the pavilion after getting run out:

ये वो लम्हा था, जब मैं खुद को रोक ना सका,
जानते हुए भी मैं तेरे लिए कुछ ना कर सका,

उस जस्बे को लिए, लगाई थी मैंने पूरी जान,
पर वो जस्बा भी मेरा आज कम पड़ गया .

दिल में थे अरमान, खुद पे था भरोसा,
हर मुश्किल को पार करने का था हौसला,

तेरे लिए आज फिर एक बार कुछ करने का था मौका,
माफ़ कर देना ऐ यार, जो आज मैं फिर से वो ना कर सका, 

ज़िन्दगी तो चलती रहेगी, बस एक गम रह जायेगा,
वो दो कदम का सफर, हर दिन कम रह जायेगा,

भरोसा करना बस, नियत में कोई कमी ना थी,
दिन आये गये लेकिन आँख में कभी ऐसी नमी ना थी. 

And there walked the man, who gave us fantastic moments in our lifetimes to be cherished for ever and ever. #RESPECT!

Source for the Image: https://in.pinterest.com/pin/849843392160616810/?lp=true

सब बढ़िया है!

There are so many ifs and buts in our lives that I wonder how can one remain happy, calm and composed with things going on all the time in our minds.

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A humble tribute to the ifs and buts which constantly seem to nag us day-in-day-out:

सब बढ़िया है, जब तक बॉस ने डाटा ना हो,
सब बढ़िया है, जब तक बीवी ने आज लेट आने पे क्लास ना लगाई हो,

सब बढ़िया है, जब तक वो लोन की ई म आई टाइम पे ना गयी हो,
सब बढ़िया है, जब तक स्कूल के प्रिंसिपल ने पप्पू की कंप्लेंट करने ना बुलाया हो,

सब बढ़िया है, जब तक किसी फॅमिली मेमबर को डॉक्टर के यहाँ ना जाना पड़ा हो,
सब बढ़िया है, जब तक पड़ोसी ने गाडी गलत पार्क करने पर लड़ाई ना करी हो,

सब बढ़िया है, जब तक किसी काली बिल्ली ने रास्ता ना काटा हो,
सब बढ़िया है, जब तक रास्ते में ड्राइव करते समय ट्रैफिक ना मिला हो,

सब बढ़िया है, जब तक बिजली, पानी इत्यादि की कोई प्रॉब्लम ना हुई हो,
सब बढ़िया है, जब तक आगे करियर कहाँ जाएगा, इसका पता ना हो,

वैसे तो सब बढ़िया ही है, जब तक!

This जब तक  in our lives is screwing us big time.

The question, though, is are we all prepared to let go of this जब तक? for actually realizing the सब बढ़िया है!

Source for the Image: https://www.pexels.com/search/good/

कभी भूले भटके!

Being caught up in the आपा धापी  of life, there are very few occasions when you end up feeling like what I did today,

or

To put it in other words, on very few occasions do we end up taking notice of the same.

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Sharing a few lines in my effort to express what it is:

कभी भूले भटके, ज़िन्दगी अपने से परे लगती है,
कभी भूले भटके, कायनात कुछ और हसीन लगती है,
कभी भूले भटके, चहचहाती चिड़ियाँ दिखती हैं,
कभी भूले भटके, ये हवा चेहरे को छूती है,

कभी भूले भटके, किसी और का ख्याल आता है,
कभी भूले भटके, इंसान इंसान नज़र आता है,
कभी भूले भटके, खुद का पता नहीं चलता,
कभी भूले भटके, इस मदहोशी का आलम आता है,

कभी भूले भटके, मन बेतहाशा सा हो जाता है,
कभी भूले भटके, वही मन कुछ गुनगुनाता है,
कभी भूले भटके, भटकना भी रास आता है,
कभी भूले भटके, उसी भटकने का अंदाज़ पसंद आता है.

और अगर, आपको ये अहसास कभी ना हुआ हो, तो कभी भटक कर तो देखिये,

भूले भटके ही सही, आप उस राह पहुंच ही जायेंगे,
जहाँ भटकना ही शायद इस जीवन का आगाज़  कराता है.

Source for the Image: https://www.shutterstock.com/search/lost

Hospital-ity!

Let me treat the word “hospitality” as two:hospital and fatality.

Without getting into the definitions of each, what one tends to attribute to the former is the latter.

Though, a hospital apart from taking care of the cases of fatality, also has a very beautiful aspect to it, which is bringing new lives into this world.

On one hand, where one can observe blood spilling all over either due to the accidents or a calamity,

On the other hand, one can witness the same blood unfolding magic of life which can be seen happening right in front of one’s eyes.

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This makes me wonder, what we call contradictions, are nothing but the 2 sides of the same coin.

For death is no different in space and time as the birth, happening every moment of our experiential lives,

Scientifically and at an individual level which might be represented in the dynamics of the trillions of cells which constitute our body.

What differs though is our perceptions in terms of which side of the coin we have a tendency to look at.

Why am I calling it a tendency is because most of us go by the same, though each and every aspect is under our control if we choose to take control.

Whatever it might be, whether you take control or not, this game of hospital-ity or the game of life & death happens day-in-day-out.

Better to take at least some control, though, if you want to enjoy this game,

For if the shuttle or the ball (depends on which sports you play), doesn’t go where you want it to,

Why the hell one is playing this game for? 😉

Source for the Image: https://www.talenthive.co.uk/blog/different-sectors-hospitality-industry

Generation F-Up!

We have heard various generations, be it X, Y, Z, ABCD or whatever.

But have we realized that we are a generation of constant follow-ups (F-Ups)?

Be it getting that piece of furniture that you might have ordered from the likes of Hometown etc. assembled,

or

The internet connection when you move to a new house installed,

or

Any other thing that you tend to live upon on a daily basis.

There is a constant need to follow up with the service providers,

Be it the government

or

the private sector.

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Makes me wonder, when as a society, we would become professional enough to meet what we say or promise.

Words have become such a loose commodity.

Whether it be reporting or reaching on time, as promised,

or

Meeting the T&C of a contract,

No matter be it on a legal piece of paper or not,

We tend to violate the trust code,

Without realising that it’s the basis of any association or communication in the society we choose to live in.

And when people start taking this code lightly, credibility is bound to go down.

Be it at a personal level, let’s say when you commit to someone for marriage,

or

As a country, where the intention is to attract investments from different quarters, which gets reflected in the indicators such as ease of doing business in a country.

The gap also represents an opportunity, in a society like ours, where doing what’s promised, becomes a key differentiator of sorts.

Wonder, when all of us will do as we say we would! 🙂

Source for the Image: https://www.shutterstock.com/search/follow-up

Let Go!

This morning, when I got up,

There was something on my mind which I hadn’t resolved the previous day.

Naturally, wasn’t feeling too good about the same.

Then realised, how beautiful the weather was.

Stepped in the balcony, where fresh cool breeze ran past my face.

Not a bad day, I thought 😉

Somehow, it struck, how random we are living our lives, without realising that one day, it’s all gonna end.

And because of this randomness, every random situation that we come across, we tend to take it super seriously.

Be it our work and what the boss says,

Be it our relationships and its dynamics,

Be it our possessions,

Be it our aspirations,

Be it our conversations and the constant endeavour to prove that what we say or believe in as the only truth that there is,

Be it the straight face that we tend to show to all the strangers or the known who pass by,

Be it the anger we tend to take out on those who are not, so called, as powerful, as we think we are,

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Without realising that it won’t really matter.

In fact, the very thing we want to achieve or aspire for becomes easily attainable,

If we don’t give too much importance to the results of the same, rather than focus on the very process needed to achieve it.

From today, I choose to let go of my seriousness,

What about you? 😉

Source for the Image: http://www.lovethispic.com/image/20870/let-go